सर्विस डॉग कैसे करते हैं सेना की मदद, ऐसे टालते हैं बड़े से बड़ा खतरा

पुलिस से लेकर सेनाओं में डॉग्‍स का रोल काफी अहम होता है. ये डॉग ट्रेनिंग के बाद अपनी तेजी जैसी कई खूबियों के कारण सेना का अहम अंग बने हुए हैं. आर्मी डॉग्स की अहमियत का अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि उन्हें सेना में रैंक भी दी जाती है

सर्विस डॉग कैसे करते हैं सेना की मदद, ऐसे टालते हैं बड़े से बड़ा खतरा
सर्विस डॉग कैसे करते हैं सेना की मदद, ऐसे टालते हैं बड़े से बड़ा खतरा

अफगानिस्‍तान से अमेरिकी फौजों के जाने के बाद एक और मसला इस समय सुर्खियों में है. कहा जा रहा है कि यूएस मिलिट्री अपने 300 सर्विस डॉग्‍स को भी अफगानिस्‍तान में तालिबान के हवाले कर आया है. इस खबर को पेंटागन कर तरफ से हालांकि पूरी तरह से गलत बताया गया है. पेंटागन के एक सीनियर जनरल ने कहा है कि ऐसा कुछ नहीं है और कोई भी सर्विस डॉग अफगानिस्‍तान में नहीं है. सर्विस डॉग किसी भी देश की सेना के लिए बहुत ही जरूरी होते हैं. आइए आपको इनके बारे में बताते हैं.


किस मिशन के लिए होती है ट्रेनिंग

सर्विस डॉग्‍स को बम और ड्रग्‍स जैसी खतरनाक चीजों को डिटेक्‍ट करने के लिए ट्रेनिंग दी जाती है. इंडियन आर्मी के पास इस समस 150 एक्‍सपर्ट्स डॉग्‍स हैं. ये डॉग्‍स लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) से लेकर कई मुश्किल जगहों पर तैनात हैं. इन्‍हें इसके साथ ही दुश्‍मन की गतिविधियों को ट्रैक करने की भी ट्रेनिंग दी जाती है. ये डॉग्‍स एक्‍सप्‍लोसिव्‍स भी डिटेक्‍ट कर सकते हैं. सेना के पास जर्मन शेफर्ड से लेकर लैब्राडोर तक हैं जो मुश्किल स्थितियों में अपने मिशन को पूरा करते हैं. भारतीय सेना द्वारा चलने वाले आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन में प्रशिक्षित कुत्तों की यूनिट को डॉग स्कवॉयड कहा जाता है जिनका बड़ा योगदान रहा है.


इन्‍हें मिलती है रैंक भी

पुलिस से लेकर सेनाओं में डॉग्‍स का रोल काफी अहम होता है. ये डॉग ट्रेनिंग के बाद अपनी तेजी जैसी कई खूबियों के कारण सेना का अहम अंग बने हुए हैं. आर्मी डॉग्स की अहमियत का अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि उन्हें सेना में रैंक भी दी जाती है. इन डॉग्स को सैनिकों की तरह ही सेना में भर्ती किया जाता है.

सर्विस डॉग कैसे करते हैं सेना की मदद, ऐसे टालते हैं बड़े से बड़ा खतरा
सर्विस डॉग कैसे करते हैं सेना की मदद, ऐसे टालते हैं बड़े से बड़ा खतरा

भर्ती के समय डॉग के लिए भी ये देखा जाता है कि वो शारीरिक तौर पर मजबूत और चुस्त दुरुस्‍त हैं या नहीं. आमतौर पर इसके लिए लेब्राडोर, बेल्जियन मैलिनॉयस और जर्मन शेफर्ड को चुना जाता है. ये तेज-तर्रार तो होते ही हैं, साथ ही कम समय में ज्यादा सीख पाते हैं. डॉग्‍स की भर्ती के बाद इनकी ट्रेनिंग होती है और खास ऑपरेशन के लिए इन्हें नियुक्त किया जाता है. जिस डॉग को जिस खास मिशन के लिए ट्रेनिंग दी जाती है, उसके हिसाब से उसे तैनाती दी जाती है.

अगर आप कभी किसी सर्विस डॉग को देखे तो फिर उसे कभी भी खाना नहीं ऑफर करें. इन डॉग्‍स को खास तरह की डाइट दी जाती है. ये डॉग्‍स वो नहीं खाते हैं जो पालतू कुत्‍ते या फिर इंसान खाते हैं. सर्विस डॉग की पीठ पर आपको अक्‍सर कोई न कोई कवर जैसी चीज देखने को मिलेगी, इसे Harness कहते हैं. हर सर्विस डॉग का काम अलग-अलग होता है.



क्‍यों सुर्खियों में हैं सर्विस डॉग्‍स

पिछले दिनों खबरें आई थीं कि अमेरिकी सेना 46 सर्विस डॉग सहित कुल 130 जानवरों को अफगानिस्तान में छोड़ आई है. इस पूरे मामले में भारत की तारीफ हो रही है, क्योंकि भारत ने अपने सर्विस डॉग्‍स को निकाल लिया था. भारतीय दूतावास के कर्मचारियों ने यह सुनिश्चित किया कि अफगानिस्तान छोड़ते वक्त तीनों सर्विस डॉग्स भी उनके साथ जाएं. माया, रूबी और बॉबी नाम के ये डॉग्स काबुल में भारतीय दूतावास में तैनात थे. जब नई दिल्ली ने वहां तैनात भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) कर्मियों को भारतीय वायु सेना की मदद से रेस्क्यु किया, तब इन डॉग्स को भी भारत लाया गया.




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